वो रोज़
वो रोज हमारे घर चीनी लेने आती थी,
अब उसके घर मैं चाय पीने जाता हूँ,
तब भी बस हम उसे देखा करते थे,
अब भी हम उसे देखा करते हैं,
वो छत पर आती थी,
शायद इशारों में बातें करने,
हम भी मुस्कुराते रहते,
वो भी मुस्कुराती रहती,
वक़्त कब निकला पता न लगा,
कम्बख्त वक़्त हमे बेवफ़ा सा लगा,
अब फर्क बस इतना हैं की,
वक़्त के पास बस हमारी यादें हैं,
वर्ना वो अभी भी 70 की हसीं हैं,
और हम 72 के जवाँ हैं,
By: अक्षत कोठियाल
Natash
23-Jun-2021 10:37 AM
👍👍👍
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Apeksha Mittal
22-Jun-2021 11:51 PM
बहुत अच्छा लिखा अपने
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